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सबसे ऊंचे शिव मंदिर तुंगनाथ की आध्यात्मिक महत्ता जानिए
देहरादून । देवभूमि उत्तराखंड की असीम वादियों में महादेव का वास है। ऐसे ही रुद्रप्रयाग जनपद में स्थित तुंगनाथ मंदिर पंच केदार यात्रा का तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है। मान्यता है कि यहां भोलेनाथ की भुजाओं की पूजा होती है। शुक्रवार को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मंदिर की महत्ता पर जोर दिया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का भव्य वीडियो शेयर किया। उन्होंने लिखा, "रुद्रप्रयाग जनपद में स्थित भगवान शिव को समर्पित श्री तुंगनाथ मंदिर पंचकेदार में से एक है। हिमालय की मनोरम पर्वत शृंखलाओं के मध्य अवस्थित यह पावन धाम आध्यात्मिक आस्था, सनातन परंपरा और अद्वितीय प्राकृतिक सौंदर्य का अनुपम संगम है। देवभूमि उत्तराखंड की यात्रा के दौरान श्री तुंगनाथ धाम के दर्शन कर भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद अवश्य प्राप्त करें।" रुद्रप्रयाग जिले में 3,680 मीटर की ऊंचाई पर स्थित दुनिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर है। बताया जाता है कि मंदिर का निर्माण महाभारत काल में किया गया था। एक पौराणिक कथा के अनुसार, मंदिर की रचना खुद पांडवों ने की थी।
महाभारत युद्ध के बाद पांडव नरसंहार से काफी दुखी थे, जिसके बाद आत्मिक शांति के लिए वे लोग हिमालय क्षेत्र में गए थे। इस दौरान भीम ने दो पहाड़ों पर पैर रखकर खड़े होकर भोलेनाथ को ढूंढना शुरू किया। गुप्तकाशी के पास उन्हें एक बैल चलते हुए दिखाई दिया, जिसे भीम ने तुरंत पहचान लिया था और अनुमान लगाया कि ये भगवान शिव ही हैं। भीम ने बैल की पूंछ और पिछली टांगें पकड़ लीं। हालांकि, शिव जी तो उन्हें नहीं मिले, लेकिन बैल के रूप में शिव जमीन में समा गए और बाद में पांच अलग-अलग हिस्सों में प्रकट हुए।
कुबड़ केदारनाथ में पीठ की पूजा होती है, तुंगनाथ में भुजाओं, मध्यमहेश्वर में नाभि और पेट की पूजा की जाती है, तुंगनाथ में भुजाओं (हाथ), रुद्रनाथ में मुख-चेहरे की और कल्पेश्वर में शिव के जटाओं (बाल) की पूजा की जाती है। पांडव शिव के इन पांच रूपों में दर्शन पाकर अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने इन पांचों स्थानों पर शिव की पूजा के लिए मंदिर बनवाए। इस तरह पांडव अपने पापों से मुक्त हो गए।
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