Karwa Chauth 2026: सुबह सरगी से लेकर पूजा तक भद्रा का साया नहीं, 29 अक्टूबर को इस समय दिखेगा चांद
Karwa Chauth 2026: सुबह सरगी से लेकर पूजा तक भद्रा का साया नहीं, 29 अक्टूबर को इस समय दिखेगा चांद
Karwa Chauth 2026: हिंदू धर्म में करवा चौथ व्रत का विशेष और अत्यंत पावन महत्व माना गया है. सुहागिन महिलाएं यह व्रत अपने पति की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुखी दांपत्य जीवन के लिए रखती हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, करवा चौथ का व्रत पूरी तरह से निर्जला रखा जाता है.
ज्योतिषाचार्य कुशेश्वर जी महाराज के अनुसार, इस वर्ष करवा चौथ का पावन पर्व गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026 को मनाया जाएगा. पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य की कामना से महिलाएं सूर्योदय से लेकर चंद्र दर्शन तक अन्न और जल का पूरी तरह त्याग करती हैं.
उत्तर भारत विशेषकर पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार में इस पर्व की विशेष धूम रहती है. इस दिन माता पार्वती, भगवान शिव, श्रीगणेश और कार्तिकेय के साथ-साथ विशेष रूप से करवा माता की पूजा की जाती है.
इस बार नहीं रहेगा भद्रा का साया
ज्योतिषाचार्य कुशेश्वर जी महाराज ने बताया कि इस वर्ष करवा चौथ के दिन पूजा और सरगी के समय भद्रा का कोई प्रभाव नहीं रहेगा:
भद्रा आरंभ: 28 अक्टूबर 2026, सुबह 05:31 बजे
भद्रा समाप्ति: 29 अक्टूबर 2026, सुबह 04:27 बजे
• व्रत की तिथि: 29 अक्टूबर 2026 (गुरुवार)
• पूजा का शुभ मुहूर्त: शाम 5:38 बजे से शाम 6:56 बजे तक
• चतुर्थी तिथि प्रारंभ: 29 अक्टूबर को रात 1:06 बजे से
• चतुर्थी तिथि समाप्त: 29 अक्टूबर को रात 10:09 बजे तक
पंचांग के अनुसार, 29 अक्टूबर की सुबह 04:27 बजे ही भद्रा समाप्त हो जाएगी. इसके चलते सुबह सरगी ग्रहण करने और दिनभर के मांगलिक कार्यों में भद्रा का कोई व्यवधान नहीं पड़ेगा. शाम के पूजन के समय भी भद्रा मुक्त वातावरण रहेगा. धार्मिक मान्यताओं में भद्रा काल को शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना जाता है, इसलिए भद्रा का न होना व्रतियों के लिए अत्यंत शुभ संकेत है.
करवा चौथ 2026: तिथि, शुभ मुहूर्त और चंद्रोदय समय
29 अक्टूबर 2026 को करवा चौथ के दिन दिल्ली में चंद्रोदय रात 8:17 बजे होगा, मुंबई में रात 9:00 बजे और कोलकाता में शाम 7:47 बजे चांद निकलेगा।
• व्रत की तिथि: 29 अक्टूबर 2026 (गुरुवार)
• पूजा का शुभ मुहूर्त: शाम 5:38 बजे से शाम 6:56 बजे तक
• चतुर्थी तिथि प्रारंभ: 29 अक्टूबर को रात 1:06 बजे से
• चतुर्थी तिथि समाप्त: 29 अक्टूबर को रात 10:09 बजे तक
करवा चौथ व्रत का धार्मिक महत्व
ज्योतिषाचार्य के अनुसार, धार्मिक मान्यता है कि वट सावित्री व्रत की भांति ही करवा चौथ का व्रत करने से पति को दीर्घायु प्राप्त होती है और वैवाहिक जीवन से सभी कष्ट व कलह दूर होते हैं. इस दिन संकष्टी चतुर्थी का भी संयोग होता है, जिसका पारण भी चंद्र दर्शन के बाद ही किया जाता है. इसलिए इस दिन सर्वप्रथम भगवान श्रीगणेश का विधिवत पूजन करने का विधान है. मान्यता है कि इस व्रत के समान अखंड सौभाग्य प्रदान करने वाला कोई अन्य व्रत नहीं है.
करवा चौथ व्रत एवं पूजन विधि
सरगी एवं संकल्प: व्रती महिलाएं प्रातः सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और पारिवारिक परंपरा के अनुसार सरगी आदि ग्रहण करें. इसके बाद पूरे दिन निर्जला व्रत रखने का संकल्प लें.
कथा श्रवण: शाम के समय तुलसी के समीप शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें और करवा चौथ की पावन व्रत कथा का पाठ करें या श्रवण करें.
पूजा थाली की तैयारी: शाम को पूजा की थाली में धूप, दीप, रोली, अक्षत, पुष्प, फल, मिष्ठान और सुहाग सामग्री (श्रृंगार का सामान) सजाएं. टोटीदार लोटे में अर्घ्य के लिए शुद्ध जल भरें और मिट्टी के करवे में चावल या चिउड़ा भरकर दक्षिणा के रूप में कुछ सिक्के रखें.
देव पूजन: सभी देवी-देवताओं, करवा माता, भगवान शिव, माता पार्वती और श्रीगणेश का तिलक कर फल, फूल व मिष्ठान अर्पित करें. सुहाग सामग्री पूजा में रखकर उसका टीका करें.
चंद्र दर्शन व अर्घ्य: रात को चंद्रमा निकलने पर लोटे से चंद्रमा को अर्घ्य दें. इसके बाद छलनी में जलता हुआ दीपक रखकर चंद्रमा के दर्शन करें और फिर उसी छलनी से अपने पति का मुख देखें.
व्रत पारण व आशीर्वाद: चंद्र दर्शन के बाद पति के हाथों से जल ग्रहण कर निर्जला व्रत का पारण करें. इसके उपरांत घर के सभी बड़े-बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें. अंत में पूजित करवा और सुहाग सामग्री अपनी सास या किसी अन्य सुहागिन स्त्री को भेंट करें.
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