Eid Al Fitr 2026: 20 या 21 मार्च कब मनाई जाएगी ईद? जानिए तारीख

रमजान का पवित्र महीना चल रहा है और इसके समापन के साथ ही मुस्लिम समुदाय में ईद-उल-फितर को लेकर उत्साह बढ़ता जा रहा है। यह पर्व इस्लाम धर्म के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक माना जाता है। एक महीने तक रोजा रखने, इबादत करने और आत्मसंयम का पालन करने के बाद ईद का दिन खुशियां और आभार व्यक्त करने का अवसर लेकर आता है। हालांकि हर साल की तरह इस बार भी ईद की तारीख को लेकर लोगों में उत्सुकता बनी हुई है, क्योंकि इसका निर्धारण चांद के दर्शन पर आधारित होता है।

ईद उल फितर 2026 कब मनाई जाएगी

ईद-उल-फितर की सही तारीख चंद्र दर्शन पर निर्भर करती है। इस्लामी कैलेंडर के अनुसार रमजान के बाद शव्वाल महीने की शुरुआत होती है और उसी महीने का पहला दिन ईद-उल-फितर के रूप में मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यदि 19 मार्च की शाम को शव्वाल का चांद दिखाई दे जाता है, तो भारत में ईद 20 मार्च को मनाई जाएगी।

अगर उस दिन चांद दिखाई नहीं देता, तो रमजान के 30 रोजे पूरे होने के बाद ईद का पर्व 21 मार्च को मनाया जाएगा। भारत में चांद दिखने की आधिकारिक घोषणा स्थानीय चांद कमेटियों और धार्मिक संगठनों द्वारा की जाती है, जिसके बाद ही ईद की अंतिम तारीख तय होती है।


रमजान और ईद का आपसी संबंध

रमजान इस्लामी कैलेंडर का नौवां महीना होता है और इसे इबादत, संयम और आध्यात्मिक साधना का समय माना जाता है। इस महीने में मुस्लिम समुदाय के लोग सूर्योदय से सूर्यास्त तक रोजा रखते हैं और ज्यादा से ज्यादा समय नमाज, कुरान पाठ और दुआ में बिताते हैं।

रमजान के समाप्त होते ही शव्वाल महीने की शुरुआत होती है और उसी का पहला दिन ईद-उल-फितर के रूप में मनाया जाता है। यह दिन रोजों की अवधि पूरी होने के बाद खुशियां मनाने और अल्लाह का शुक्रिया अदा करने का प्रतीक माना जाता है।


ईद उल फितर का धार्मिक महत्व

ईद-उल-फितर को आपसी भाईचारे, दया और साझा खुशियों का त्योहार माना जाता है। इस दिन सुबह विशेष नमाज अदा की जाती है, जिसके बाद लोग एक-दूसरे को गले लगाकर ईद की मुबारकबाद देते हैं।

घरों में खास पकवान बनाए जाते हैं, जिनमें सेवइयां, शीरखुरमा और कई तरह के मीठे व्यंजन शामिल होते हैं। परिवार और रिश्तेदार एक-दूसरे के घर जाकर मिलते हैं और त्योहार की खुशियां साझा करते हैं। यह पर्व समाज में आपसी सौहार्द और प्रेम का संदेश भी देता है।

जकात और फितरा का महत्व

ईद-उल-फितर से पहले जकात और फितरा देने की परंपरा भी इस्लाम में महत्वपूर्ण मानी जाती है। जकात को इस्लाम के प्रमुख स्तंभों में शामिल किया गया है, जिसके तहत आर्थिक रूप से सक्षम लोग अपनी संपत्ति का एक हिस्सा जरूरतमंदों की मदद के लिए देते हैं।

इसके अलावा फितरा या सदका-ए-फित्र भी ईद से पहले दिया जाता है। इसका उद्देश्य यह होता है कि समाज के गरीब और जरूरतमंद लोग भी ईद की खुशियों में शामिल हो सकें। यह परंपरा सामाजिक समानता और सहयोग की भावना को मजबूत बनाती है।


ईद उल फितर का इतिहास

इस्लामी परंपराओं के अनुसार ईद-उल-फितर की शुरुआत पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब के समय से मानी जाती है। माना जाता है कि सन् 624 ईस्वी में बदर की ऐतिहासिक लड़ाई के बाद पहली बार मुसलमानों ने ईद-उल-फितर मनाई थी। उस समय इस पर्व को अल्लाह का शुक्रिया अदा करने और समुदाय के बीच खुशियां बांटने के रूप में मनाया गया था।

तब से यह पर्व हर साल पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है और आज भी इसका मूल संदेश आपसी प्रेम, दया और आस्था से जुड़ा हुआ है।

ईद की तैयारियां और उत्सव

ईद से पहले घरों में साफ-सफाई, खरीदारी और पकवानों की तैयारी शुरू हो जाती है। लोग नए कपड़े खरीदते हैं और घरों को सजाते हैं। ईद की नमाज के बाद रिश्तेदारों और दोस्तों से मुलाकात का सिलसिला चलता है और लोग एक-दूसरे को मिठाइयां बांटकर शुभकामनाएं देते हैं।

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